रात के गहरे साये में, दून की हर एक दीवार बोलती है,
भूख की आग से, हर एक रूह यहाँ दोस्ती है।
घंटाघर की छांव मेरा बिस्तर, सितारे मेरी छत,
सपनों की तलाश में, कटती है हर एक रात।
खाली जेब, पर दिमाग मेरा करोड़-पति,
अस्लियत की धूल में, ढूँढूँ मैं प्रगति।
स्मार्ट सिटी की फ़ाइल में हम बस एक नंबर हैं,
पर गली की कोशिश में, हम ही तो प्लंबर हैं।
Chorus
ग़रीबी की धूप में, हमने हौसला बुना है,
ज़िंदगी ने हमें, हर बार नया दुख सुना है।
उठते हैं बार-बार, गिर के इस घाटी में,
लोहा बन जाते हैं, रह के इस भट्टी में।
सपना बड़ा है, पर रास्ता थोड़ा तंग,
हर दिन हम लड़ते हैं, कुदरत से एक जंग!
Verse 2
चाय की टपरी पे, राजपुर रोड के पास,
किस्मत के पन्नों पे, लिखते हम अपनी आस।
दून की इस बारिश में, भीगा मेरा नसीब,
मेहनती हाथ मेरे, पर ख़्वाब बड़े अजीब।
रिस्पना नदी के किनारे, गूंजती ये पुकार,
हमें भी चाहिए, जीने का अधिकार।
सिस्टम की दीवारों से, टकरा के देखा है,
हमने अपनी लकीरों को, खुद ही तो रेखा है।
Chorus
ग़रीबी की धूप में, हमने हौसला बुना है,
ज़िंदगी ने हमें, हर बार नया दुख सुना है।
उठते हैं बार-बार, गिर के इस घाटी में,
लोहा बन जाते हैं, रह के इस भट्टी में।
सपना बड़ा है, पर रास्ता थोड़ा तंग,
हर दिन हम लड़ते हैं, कुदरत से एक जंग!
Outro
क्यों? क्यों ये लकीरें, सिर्फ बस्ती में मिलती हैं?
क्यों हमारी मेहनत, तुम्हारे महलों में खिलती है?
मसूरी की चमक से दूर... बस एक बार...
इस भीड़ में, हमें भी पहचान।
अस्लियत यही है। दून के वासी। पीस आउट।
© 2026 दिनेश नयाल. सर्वाधिकार सुरक्षित

