Wednesday, 12 August 2026

दून की हकीकत



रात के गहरे साये में, दून की हर एक दीवार बोलती है,

भूख की आग से, हर एक रूह यहाँ दोस्ती है।

घंटाघर की छांव मेरा बिस्तर, सितारे मेरी छत,

सपनों की तलाश में, कटती है हर एक रात।

खाली जेब, पर दिमाग मेरा करोड़-पति,

अस्लियत की धूल में, ढूँढूँ मैं प्रगति।

स्मार्ट सिटी की फ़ाइल में हम बस एक नंबर हैं,

पर गली की कोशिश में, हम ही तो प्लंबर हैं।


​Chorus

ग़रीबी की धूप में, हमने हौसला बुना है,

ज़िंदगी ने हमें, हर बार नया दुख सुना है।

उठते हैं बार-बार, गिर के इस घाटी में,

लोहा बन जाते हैं, रह के इस भट्टी में।

सपना बड़ा है, पर रास्ता थोड़ा तंग,

हर दिन हम लड़ते हैं, कुदरत से एक जंग!


​Verse 2

चाय की टपरी पे, राजपुर रोड के पास,

किस्मत के पन्नों पे, लिखते हम अपनी आस।

दून की इस बारिश में, भीगा मेरा नसीब,

मेहनती हाथ मेरे, पर ख़्वाब बड़े अजीब।

रिस्पना नदी के किनारे, गूंजती ये पुकार,

हमें भी चाहिए, जीने का अधिकार।

सिस्टम की दीवारों से, टकरा के देखा है,

हमने अपनी लकीरों को, खुद ही तो रेखा है।


​Chorus

ग़रीबी की धूप में, हमने हौसला बुना है,

ज़िंदगी ने हमें, हर बार नया दुख सुना है।

उठते हैं बार-बार, गिर के इस घाटी में,

लोहा बन जाते हैं, रह के इस भट्टी में।

सपना बड़ा है, पर रास्ता थोड़ा तंग,

हर दिन हम लड़ते हैं, कुदरत से एक जंग!


​Outro

क्यों? क्यों ये लकीरें, सिर्फ बस्ती में मिलती हैं?

क्यों हमारी मेहनत, तुम्हारे महलों में खिलती है?

मसूरी की चमक से दूर... बस एक बार...

इस भीड़ में, हमें भी पहचान।

अस्लियत यही है। दून के वासी। पीस आउट।


 ​© 2026 दिनेश नयाल. सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, 30 April 2021

पहाड़ी सफर


पहाड़ों के सफर में हूँ,
पहाडों को देखता हूँ..

अप्रतिम सौदर्य ओढें
इस नीली धरा में ,,
वो सफेद नीली वर्दी
आँखो में निश्चल सपना लिए
हँसते खेलते बस्ते ,
,
पहाड़ों के सफर में हूँ,
पहाड़ों को देखता हूँ,
,
वो घुमावदार और तीखे रास्ते,
वो नदियों का बहना 
और एक बड़ा समंदर बनाना
उर्जा का स्त्रोत है जहाँ,
,
पहाडों के सफर में हूँ ,
पहाड़ों को देखता हूँ
,
वो बाँज देवदार वृक्ष 
की घनी छाँव भरी ठंडक,
वो तीखे सख्त चट्टानो की गर्मी,
नरम और सख्त 
मौसम का ऐहसास,
,
पहाड़ों के सफर में हूँ,
पहाड़ों को देखता हूँ
,
वह खुली दुकानें 
जो हमारे इंतजार कर रही थीं,
चुल्हे से उतरती रोटी का स्वाद
हमने चखा था जो
निसंदेह स्वादिष्ट थी,
वो चाय जिसमें मीठा कम
अपनापन ज्यादा था
,
पहाड़ों के सफर में हूँ,
पहाड़ों को देखता हूँ,
,
फिर वह पानी देखा
जो पहाडों में ठहरा हुआ था
लेकिन फिर उस जवानी को 
देख आँख भर आई 
जो ढलानों में बह गई,,
,
पहाड़ों के सफर में हूँ,
पहाड़ों को देखता हूँ..

सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
रचनाकार: ©दिनेश सिंह नयाल
यमकेश्वर, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
30 अप्रेल, 2021